जैन तेरापंथ धर्मसंघ के साध्वी समाज की प्रमुख “शासनमाता” Sadhvipramukha Kanakprabha जी ने आज सुबह 8:45 पर छत्तरपुर स्थित अध्यात्म साधना केंद्र में अंतिम श्वास ली. वो तेरापंथ की शान और सम्पूर्ण महिला समाज की गौरव थी. पिछले अनेकों दिनों से वो असाध्य बीमारी केंसर से जूझ रही थी. लम्बे समय से उनका केंसर विशेषज्ञ डॉक्टर राजेश कुण्डलिया की देख रेख में इलाज चल रहा था.
साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा जी ने अणुव्रत आन्दोलन के प्रवर्तक आचार्य तुलसी, प्रेक्षाध्यान के प्रणेता आचार्य महाप्रज्ञ और तेरापंथ के वर्तमान आचार्य महाश्रमण के शासनकाल में साध्वीप्रमुखा के तौर पर कुशल प्रशासक, गहन जनसंपर्क, धर्म आराधना व साहित्य लेखन आदि गतिविधियों से जैन जीवन शैली के चरमोत्कर्ष को प्राप्त किया है. भक्तों का मानना है कि उनकी प्रतिभा और सेवा की रश्मियाँ हमें सदियों तक आलोकित करती रहेगी.
तेरापंथी महासभा के केम्प ऑफिस द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार असाध्य बीमारी को साधने में जुटी शासनमाता के देवलोकगमन की खबर पूरे धर्मसंघ को शोक की लहरों में डूबा गई. तेरापंथ समाज मानों आज अपनी ममतामयी, करुणामयी शासनमाता के महाप्रयाण के बाद अनाथता की अनुभूति कर रहा था. देवलोकगमन की खबर देश-दुनिया में जंगल की आग की तरह फैली तो देखते-देखते ही अध्यात्म साधना केन्द्र जनाकीर्ण बन गया. शासनमाता के पार्थिव शरीर को श्रद्धालुओं ने अनुकंपा भवन से अंतिम दर्शन के लिए वर्धमान समवसरण में स्थापित किया.
अनमोल जीवन था साध्वीप्रमुखा का
प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि 22 जुलाई सन् 1942 को राजस्थान के नागौर जिले के लाडनूं के श्री सूरजमल बैद परिवार में आपका जन्म हुआ. प्रारम्भ से ही अध्यात्म पथ पर गति करने की अभिलाषा रखने मुमुक्षु कला ने 15 वर्ष की अल्पायु में तेरापंथ धर्मसंघ की पारमार्थिक शिक्षण संस्था में प्रवेश प्राप्त किया और 19 वर्ष की अवस्था में 8 जुलाई सन् 1960 को तेरापंथ धर्मसंघ के नवमें अधिशास्ता आचार्य तुलसी से जैन दीक्षा स्वीकार की.

अपनी लगन, सरलता, ऋजुता, संघ निष्ठा, आचार निष्ठा, व्यापक सोच, विशिष्ट कर्तृत्व, वैदुष्य कला से अपने आचार्यों का विश्वास प्राप्त किया. तीस वर्ष की आयु में ही आचार्यश्री तुलसी ने 12 जनवरी 1972 गंगाशहर में साध्वी कनकप्रभा को तेरापंथ धर्मसंघ के साध्वी समुदाय के आठवीं साध्वीप्रमुखा के रूप में प्रतिष्ठित किया. आपने अपने जीवनकाल में 80 हजार से अधिक किलोमीटर की पदयात्रा की. हिन्दी, संस्कृत, प्राकृत, गुजराती भाषा में अनेक कृतियों का सृजन करने के साथ लगभग 85 से अधिक पुस्तकों का संपादन कार्य भी किया.
इस प्रकार आपने अपनी प्रतिभा से साहित्य जगत को अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया. तेरापंथ धर्मसंघ में 500 से अधिक साध्वियों के कुशल नेतृत्वकर्ता के साथ नारी जगत की मानों वे सुमेरू पर्वत के समान थीं. अपने गुरुओं से कभी सौ में से सवा सौ नम्बर प्राप्त किया तो कभी तेरापंथ धर्मसंघ की असाधारण साध्वीप्रमुखा बनकर अपने पद को विभूषित किया. अपने दीक्षा के 50 वर्षों की सम्पन्नता पर लाडनूं में आयोजित अमृत महोत्सव के दौरान युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी द्वारा आपको शासनमाता का अलंकरण प्रदान किया.

Sadhvipramukha Kanakprabha की अंतिम यात्रा में उमड़ी भीड़
सायं लगभग चार बजे निकली बैंकुठी यात्रा में मानों आस्था का सागर हिलोरें ले रहा था. हाजरों-हजारों सजल नेत्र अपनी शासनमाता को अंतिम विदाई दे रहे थे. वर्धमान समवसरण से उठी बैंकुठी अध्यात्म साधना केन्द्र अनुकंपा भवन के निकट ही स्थित बने स्थान में पहुंची. जहां सायं लगभग पांच बजे शासनमाता को मुखाग्नि दी गई. इस प्रकार तेरापंथ धर्मसंघ की अष्टम साध्वीप्रमुखा पंचतत्त्व में विलीन हो गईं.
शासनमाता Sadhvipramukha Kanakprabha के देवलोकगमन की जानकारी प्राप्त होते ही भारत के राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, गुजरात के गृहमंत्री श्री हर्ष संघवी सहित अनेक राजनैतिक महानुभावों ने भी संदेशों व ट्वीट के माध्यम से अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की. वहीं केन्द्रीय मंत्री श्री अर्जुनराम मेघवाल एवं दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन आदि अंतिम दर्शन को पहुंचे.
