दिल्ली बॉर्डर पर बैठे किसानों के साथ चल रही बातचीत में कोई नतीजा ना निकलना अब खलने लग गया है. चर्चा हो रही है कि बातचीत के नाम पर किसानों को लटका कर रखा जा रहा है. केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच शुक्रवार को एक बार फिर बातचीत का दौर चला. सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटी के बाद सरकार-किसान के बीच हुई ये पहली वार्ता थी. लेकिन इस बार भी कुछ अलग नहीं दिखा. दिल्ली के विज्ञान भवन में हुई नौवें दौर की बातचीत भी बेनतीजा रही. किसान संगठनों की ओर से अब भी कृषि कानून वापस लेने पर जोर दिया जा रहा है.
आज की मीटिंग में भी वही घिसीपिटी बातें हुई. कानूनों के फायदे बताये गये. 9 मीटिंगों में भी ऐसा ही है तो लटकाना नही तो और क्या? आज की बैठक में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि हम तीनों कानूनों को वापस नहीं लेंगे, लेकिन हम संशोधन करने को तैयार है. जबकि बैठक में किसानों ने सख्त रुख अपनाया और कहा कि तीनों कानून तो वापस लेने पड़ेंगे उससे कम हम मानेंगे नहीं. बैठक में कृषि मंत्री की ओर से किसानों को गिनाया गया कि देश में बड़े स्तर पर किसान कानून के समर्थन में हैं, जबकि किसानों ने कहा कि फिर भी देशभर में प्रदर्शन हो रहा है.
कृषि मंत्री के अलावा पीयूष गोयल ने भी बैठक में कृषि कानूनों से जुड़े फायदों को गिनाया. हालांकि, अब किसानों की ओर से पंजाब में हुई छापेमारी, हरियाणा मे किसानों पर लिए गए एक्शन का मसला उठाया गया. किसानों की मांग है कि सभी मुकदमे वापस लिए जाने चाहिए.

चिन्तनशील किसानों का विश्लेषण
सरकार और किसानों के बीच 9 वीं वार्ता में भी इस तरह की बातचीत सामने आना आश्चर्यजनक है. मीडिया भी इस वार्तालाप को बढ़ा चढ़ाकर दिखा रहा है. कहीं ना कहीं कुछ रहष्यमय है. अन्दर में क्या चल रहा है, यह आम किसान और आम जनता समझ नही पा रही है. लेकिन कुछ विश्लेषक हर बात और हर इशारे की गहराई तक जाने की सौच रखते हैं. ऐसे ही चिन्तनशील लोगों में सरकार द्वारा किसानों को लटकाए जाने की बात की जा रही है.
किसान संगठनों से वार्ता के बाद संवाददाताओं से बातचीत में केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा, ‘वार्ता सौहार्दपूर्ण माहौल में संपन्न हुई. आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन पर विस्तार से चर्चा हुई. इस कानून के बारे में विस्तार से बताया गया और किसानों की शंकाओं के समाधान की कोशिश की गई लेकिन चर्चा निर्णायक मोड़ पर नहीं पहुंच पाई.’ उन्होंने कहा कि सरकार और किसान संगठनों ने अब 19 जनवरी को फिर से वार्ता करना तय किया है.
तोमर ने कहा, ‘हमने उनको (किसान संगठनों) यह भी सुझाव दिया कि वे चाहें तो अपने बीच में एक अनौपचारिक समूह बना लें. जो लोग ठीक प्रकार से कानून पर बात कर सकते हैं. सरकार से उनकी अपेक्षा क्या है? कानूनों में किसानों के प्रतिकूल क्या है. इसपर आपस में चर्चा करके और कोई मसौदा बनाकर वे सरकार को दें तो सरकार उसपर खुले मन से विचार करने को तैयार है.
